शक्ति साधना का केंद्र हैं ‘मां कामाख्या’, मां के मंदिर के ये रहस्य जानकर हो जाएंगे दंग!

नई दिल्ली – मां कामाख्या का मंदिर गुवाहाटी (असम) से 8 किलोमीटर दूर नीलांचल पर्वत पर स्थित है। माता के सभी शक्तिपीठों में इस शक्तिपीठ को सबसे शक्तिशाली माना जाता है। मां के इस मंदिर का पहाड़ी पर बने होने के पीछे विशेष अर्थ है। यह मंदिर मां के अनेक रूपों में से एक देवी सती का है। प्राचीन कहावतों के मुताबिक माता सती के प्रति भगवान शिव का मोह भंग करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के मृत शरीर के 51 भाग किए थे। Secret of kamakhya temple.

माता सती के शरीर के अंग जहां-जहां गिरे, उन्हें शक्तिपीठ कहा जाने लगा। ऐसा कहा जाता है कि यहां पर माता सती का गुह्वा मतलब योनि भाग गिरा था, जिससे कामाख्या महापीठ की उत्पत्ति हुई। ऐसी मान्यता है कि देवी का योनि भाग होने की वजह से यहां माता रजस्वला होती हैं। मां कामाख्या के इस शक्तिपीठ के कई चमत्कार और रोचक तथ्य हैं।

ऐसे हुआ सर्वशक्तिशाली शक्तिपीठ का निर्माण –

यह मंदिर पौराणिक इतिहास के 108 शक्तिपीठों में शामिल है। इसके निर्माण के पीछे पौराणिक तथ्य यह है कि, भगवान शिव द्वारा गौरी माता उनके पिता दक्ष द्वारा किए जा रहे हैं महायज्ञ में शामिल होने से रोक दिया गया। इसी बात पर क्रुद्ध होकर देवी सती अपने पति शिव जी की आज्ञा लिए बिना कहीं चलीं गईं। उनके पिता दक्ष ने भी भगवान शिव का इस बात को लेकर अपमान किया। देवी सती पिता के द्वारा पति के इस अपमान को सहन नहीं सकीं और हवन कुंड में ही कूद कर आत्मदाह कर लीं।

भगवान शिव देवी सती के आत्मदाह से क्रोधित हुए और दक्ष से प्रतिशोध लेने के लिए यज्ञ स्थल पर देवी सती के मृत शरीर को कंधे पर रखकर तांडव करने लगे। भगवान शिव के विकराल रूप को देखकर विष्णु जी ने सुदर्शन चक्र से देवी सती के शरीर के 51 टुकड़े कर दिये, वो जिन स्थानों पर गिरे उन्हें शक्तिपीठ कहा जाने लगा।

मां हर साल यहां होती हैं रजस्वला –

इस पीठ के संबंध में सबसे रोचक तथ्य यह है कि इस जगह पर मां का योनि भाग गिरा था, जिसके कारण माता हर साल यहीं तीन दिनों तक रजस्वला होती हैं। इस दौरान मंदिर को आम लोगों के लिए बंद रखा जाता है।

मंदिर में नहीं है देवी की मूर्ति –

क्योंकि, यहां पर देवी के योनि भाग की ही पूजा की जाती है, इसलिए इस मंदिर में देवी की मूर्ति ही रखी है। मंदिर के अंदर एक कुंड है, जिसे हमेशा फूलों से ढक कर रखा जाता है। इसी कुंड के पास एक मंदिर है जहां पर देवी की मूर्ति स्थापित है। इस पीठ को माता के अन्य सभी पीठों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

देवी के मासिक धर्म से लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी –

मां कामाख्या के इस शक्तिपीठ के बारे में मान्यता है कि देवी के मासिक धर्म से यहां पास में स्थित ब्रह्मपुत्र नदी लाल हो जाती है। मां का यह मंदिर बेहद खूबसूरत है और देश के सभी मंदिरों से अपनी खूबसूरती के कारण काफी अलग भी है। ब्रम्हपुत्र नदी के किनारे पर स्थित मंदिर अपनी प्राकृतिक सुंदरता से परिपूर्ण है।

प्रसाद के रूप में मिलता है गीला वस्त्र –

मां कामाख्या के इस मंदिर के अनेक रोचक तथ्यों और चमत्कारों में से एक यह भी है कि यहां पर भक्तों को प्रसाद के रूप में एक गीला वस्त्र दिया जाता है, जिसे अम्बुवाची वस्त्र कहा जाता है। यह वस्त्र देवी के रजस्वला होने के दौरान उनकी मूर्ति के आस-पास बिछा दिया जाता है, जो आमतौर पर सफेद होता है। तीन दिन बाद मंदिर के दरवाजे खोले जाने पर यह वस्त्र माता के रज से लाल रंग से भीग जाता है। जिसे भक्तों को प्रसाद के रूप में दिया जाता है।

कामाख्‍या मंदिर है तंत्र विद्या का सबसे बड़ा स्थल –

कामाख्‍या मंदिर को तंत्र विद्या का सबसे बड़ा केंद्र माना गया है। यहां पर हर साल जून के महीने में अंबुवासी मेला लगता है, जिसमें देश के हर कोने से साधु-संत और तांत्रिक इकट्ठा होकर तंत्र साधना करते हैं। इस दौरान मां के रजस्‍वला होने का उत्सव मनाया जाता है। मां के रजस्‍वला होने के समय ब्रह्मपुत्र नदी का पानी तीन दिन के लिए लाल रहता है। अगर संक्षेप में कहें तो यह मंदिर स्त्री की रचनात्मकता को प्रदर्शित तो करता ही है साथ ही साथ यह भी दर्शाता है कि स्‍त्री ही ब्रम्हांड की जननी है।